Friday, 17 December 2010

प्रदीप बतरा की सीधी बात

Under democracy one party always devotes its chief energies to trying to prove that the other party is unfit to rule - and both commonly succeed, and are right.
आज के दैनिक जागरण में प्रदीप बतरा का पैंफलेट पढा। मै प्रदीप बतरा के विचारों से सहमत हूँ कि दो सभासदों द्वारा नगरपालिका कर्मचारी के साथ किया गया व्यवहार सही नही था तथा इसके लिये उन्हें संबंधित कर्मचारी से माफी माँगनी चाहिये थी। परंतु इन सभासदो ने ऐसा नही किया (किस की शह पर, पता नही)। परिणाम स्वरूप खामियाजा शहर की जनता को गंदगी के रूप मे भुगतना पडा। यह तो प्रदीप बतरा का बडप्पन ही था जो नगरपालिका कर्मचारियों ने इसे राजनैतिक मुद्दा न बनाते हुये अपनी हडताल वापस ले ली और नगर मे सफाई पुन: बहाल हो गयी।

वैसे प्रदीप बतरा जी का कहना सही है कि इस सबके पीछे राजनैतिक साजिश थी। उनका यह कहना भी सही है कि एक निर्दलीय चेयरमैन होने के नाते उन्हें काम नही करने दिया जा रहा है। उन्हें काम करने से रोकने वाले वे लोग हैं जो खुद निकम्मे हैं तथा शहर का विकास उनकी प्राथमिकता सूची मे दूर - 2 तक नही है। ये लोग सिर्फ किस्मत के राजा हैं।

अब प्रदीप बतरा को चाहिये कि जनता को विश्वास मे लेकर कार्य करें तथा जो लोग उन्हें काम करने से रोक रहें हैं उन्हें बेनकाब करें। समय-समय पर जनता से संवाद कायम करें।

किसी ने सही कहा है कि
Bad officials are elected by good citizens who do not vote.

और अंत में: प्रदीप बतरा का यह कहना दुरुस्त है कि उनके चेहरे पर माँगी हुयी हँसी तो नही है। बात सही है, आज वो जो हैं वह अपनी मेहनत से तथा साई की कृपा से हैं। जो मुस्कराहट उनके चेहरे पर सदैव रहती है वह एक सेल्फ मेड व्यक्ति के चेहरे पर ही नजर आ सकती है। कम से कम उनकी हँसी मे कुटिलता तो नही है।
Politics is the art of looking for trouble, finding it whether it exists or not, diagnosing it incorrectly, and applying the wrong remedy.

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